"भैया, हमार पुरखा कहाँ से गइलन?" यह सवाल सिर्फ एक खोज नहीं, बल्कि उस खोए हुए रिश्ते को फिर से जोड़ने की छटपटाहट है जो आज से डेढ़ सौ साल पहले कोलकाता के बंदरगाहों से पानी के जहाजों पर शुरू हुई थी। अगर आपके पूर्वज भी गिरमिटिया (Indentured Labourers) बनकर मॉरीशस, फिजी, गयाना, सूरीनाम या त्रिनिदाद गए थे, तो कोलकाता बंदरगाह के धूल-धूसरित 'डिपो नंबर' और 'शिप लॉग्स' में आज भी उनके घर का पता सुरक्षित है। आइए, आपकी इस खोज को आसान बनाते हैं।
क्या हैं ये रिकॉर्ड और क्यों हैं सबसे महत्वपूर्ण?
साल 1834 से 1917 के बीच, लाखों भारतीयों को 'गिरमिट' (Agreement का अपभ्रंश) के तहत विदेशों में भेजा गया। कोलकाता (तब कलकत्ता) के बंदरगाह से रवाना होने से पहले हर एक प्रवासी का एक 'इमिग्रेशन पास' (Emigration Pass) बनाया जाता था। इस पास में उनका नाम, उनके पिता का नाम, उम्र, जाति, शारीरिक पहचान के निशान और सबसे महत्वपूर्ण—उनके जिले (Zillah), परगने, थाने और गांव का नाम दर्ज होता था।
याद रखिए: 'जहाजी भाई' का रिश्ता
पुराने दस्तावेजों को खोजने से पहले अपने बुजुर्गों से बात करें। अक्सर पारिवारिक लोकगीतों, पूजा-पद्धति या दादा-दादी द्वारा लिए जाने वाले अजीब नामों में उस 'जहाज' (Ship) का नाम छिपा होता है जिससे वे गए थे। गिरमिटिया इतिहास में एक ही जहाज पर सफर करने वाले लोग 'जहाजी भाई' कहलाते थे, और उनके परिवार आज भी आपस में जुड़े हुए हैं।
खोज की शुरुआत कैसे करें: चरण-दर-चरण मार्गदर्शिका
01
पारिवारिक मौखिक इतिहास और दस्तावेज़ जुटाएं
घर के सबसे बुजुर्ग सदस्य से उनके परदादा/परदादी का नाम, उनके साथ गए रिश्तेदारों के नाम और यदि संभव हो तो उनके देश पहुँचने का अनुमानित वर्ष पूछें।
02
डिपो नंबर या एग्रीमेंट नंबर (Agreement Number) खोजें
मॉरीशस के महात्मा गांधी संस्थान (MGI), फिजी के नेशनल आर्काइव्स, या सूरीनाम/गयाना के राष्ट्रीय अभिलेखागारों से संपर्क करें। वहां उनके नाम या आगमन तिथि से उनका 'इमिग्रेशन सर्टिफिकेट' या 'डिपो नंबर' प्राप्त करें।
03
कोलकाता शिप-डिपार्चर लॉग्स (Calcutta Port Records) खंगालें
एक बार डिपो नंबर और जहाज का नाम मिल जाने पर, ब्रिटिश लाइब्रेरी (लंदन) के 'इंडिया ऑफिस रिकॉर्ड्स' या कोलकाता स्टेट आर्काइव्स के ऑनलाइन/ऑफलाइन डेटाबेस में उस विशिष्ट वर्ष के प्रस्थान रजिस्टर को देखें।
04
गांव और थाने के नाम का मिलान करें
इमिग्रेशन पास पर दर्ज 'जिल्ला' (Zillah) और 'थाना' (Thana) को आज के आधुनिक भारतीय जिलों और थानों से मिलाएँ, क्योंकि समय के साथ कई जिलों के नाम बदल चुके हैं।
इमिग्रेशन पास के मुख्य स्तंभों को समझना
| कॉलम का नाम | दस्तावेज़ में क्या दर्ज है | आपके लिए इसका क्या महत्व है |
|---|
| Depot Number / Register No. | एक विशिष्ट पहचान संख्या | यह आपके पूर्वज का 'यूनिक आईडी' है जिसके जरिए सारे रिकॉर्ड खुलते हैं। |
| Caste / Tribe | अहीर, चमार, कोइरी, राजपूत आदि | इससे परिवार के सामाजिक ताने-बाने और गांव में उनकी मूल बस्ती (टोला) को खोजने में मदद मिलती है। |
| Zillah / Pergunnah / Village | जैसे- शाहबाद, गाजीपुर, जौनपुर | यह आपके पूर्वज का सटीक पैतृक पता है। परगना और गांव से सीधे उनके खेत-खलिहान तक पहुंचा जा सकता है। |
| Ship's Name | जैसे- 'Sutlej', 'Ganges' आदि | जहाज के नाम से प्रस्थान और आगमन की सटीक तारीख और सह-यात्रियों की सूची मिल जाती है। |
“कलकत्ता से छूटी जहाजिया, पिया मोर गइले बिदेसवा... पूरब की माटी छोड़के, पश्चिम देसवा की ओर। — एक पुराना भोजपुरी पूर्वी लोकगीत, जो उस दर्द को बयां करता है जब हमारे पुरखों ने अपनी चौखट छोड़ी थी।
भारत में अपने मूल गांव तक पहुँचने का अंतिम पड़ाव
जब आपको जिला, थाना और गांव का नाम मिल जाए, तो ध्यान रखें कि औपनिवेशिक काल की स्पेलिंग (जैसे 'Ghazipur' को 'Ghazeepore' या 'Arrah' को 'Shahabad' लिखना) अलग हो सकती है। इन नामों को हिंदी में लिखकर स्थानीय तहसील या ब्लॉक कार्यालय से संपर्क करें। आप 'वंश वृक्ष' (Vansh Vriksha) पर अपने पूर्वजों की प्रोफ़ाइल बनाकर इस जानकारी को साझा कर सकते हैं, जिससे भारत में रह रहे आपके दूर के भाई-बंधु (जो शायद उसी गांव में आज भी रहते हैं) आपसे संपर्क कर सकें।
- वर्तनी (Spelling) की भिन्नता पर ध्यान दें: ब्रिटिश क्लर्क अक्सर भारतीय नामों को गलत लिखते थे, इसलिए ध्वन्यात्मक (phonetic) उच्चारण के आधार पर नाम खोजें।
- पुराने नक्शों का उपयोग करें: 19वीं सदी के राजस्व मानचित्र (Revenue Maps) या गजेटियर (Gazetteers) आपके पूर्वजों के परगने की सीमाएं समझने में बहुत मददगार होते हैं।
- स्थानीय कुलदेवी/देवता से संपर्क जोड़ें: हर भोजपुरी/अवधी गांव के अपने 'डीह बाबा' या कुलदेवी होती हैं। गांव पहुंचने पर इनके बारे में पूछना आपको सीधे आपके वंशजों से मिला सकता है।